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rahasya

वो एक रात

December 25, 2024
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करण एक ट्रेवल ब्लॉगर था, जिसे नई-नई और अनजानी जगहों की यात्रा करना और वन्य जीवन की तस्वीरें खींचना बहुत पसंद था। दिसंबर की ठंडी और धुंधली रात में वह पहाड़ी ज़िले के एक सुदूर इलाके से अपनी मोटरसाइकिल से होकर गुज़र रहा था। रात के करीब ग्यारह बज चुके थे और अचानक आसमान में काले घनघोर बादल छा गए और मूसलाधार बारिश होने लगी। वर्षा इतनी तेज थी कि करण की बाइक का इंजन अचानक बंद हो गया। चारों तरफ घने जंगल और पहाड़ियाँ थीं, पानी और हवा की तेज साँय-साँय की आवाज़ आ रही थी। करण के फोन का नेटवर्क भी पूरी तरह गायब हो चुका था और वह पूरी तरह से असहाय महसूस कर रहा था।

करण ने घबराहट में चारों तरफ अपनी टॉर्च से रोशनी डाली। उसे दूर पहाड़ी के कोने पर एक छोटा सा पुराना लकड़ी का घर दिखाई दिया, जिसकी खिड़की से हल्की लाल बत्ती की रोशनी छनकर आ रही थी। करण अपनी बाइक को घसीटता हुआ उस घर के दरवाजे पर पहुँचा। उसने कांपते हाथों से दरवाज़ा खटखटाया, "कोई है क्या? प्लीज़ दरवाज़ा खोलो।"

कुछ ही क्षणों में दरवाज़ा खुला और सामने एक बेहद बूढ़ी महिला खड़ी थी। उनका चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था और उनके सफेद बाल कंधों पर बिखरे थे। उनकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने एक पुराना शॉल ओढ़ रखा था। करण को देखकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "आ जाओ बेटा, इस डरावनी और तूफानी रात में तुम यहाँ क्या कर रहे हो? अंदर आ जाओ।" करण ने राहत की सांस ली और अंदर चला गया।

घर के अंदर एक पुरानी अंगीठी जल रही थी, जिससे पूरा कमरा बहुत ही गर्म और आरामदायक लग रहा था। बूढ़ी माँ ने करण को गर्म तौलिया दिया और उसके लिए अदरक वाली चाय बनाई। करण ने गरमा-गरम चाय पीते हुए अपना परिचय दिया और बताया कि वह रास्ता भटक गया है। बूढ़ी महिला ने हंसते हुए कहा, "बेटा, यहाँ पहाड़ी पर रास्ता भटकना बहुत आम बात है। जीवन भी इस पहाड़ की तरह ही है, जहाँ हम अक्सर कंकरीट की सड़कों पर खो जाते हैं।"

करण ने दीवार पर लगी एक बहुत पुरानी और धूल जमी सुनहरी फ्रेम वाली तस्वीर देखी। उस तस्वीर में वही बूढ़ी महिला एक सुंदर युवती के रूप में अपने परिवार के साथ खड़ी थीं, लेकिन तस्वीर के कोने पर "१९४७" लिखा हुआ था। करण को थोड़ा आश्चर्य हुआ। चालीस-पचास साल पहले की तस्वीर में भी यह घर वैसा ही दिख रहा था। करण ने जब उनसे पूछा कि वे इस सुनसान पहाड़ी पर अकेली क्यों रहती हैं, तो उन्होंने शांत स्वर में कहा, "मैं यहाँ अकेली नहीं हूँ बेटा। यहाँ की प्रकृति, हवा, पेड़ और तुम जैसे भूले-भटके मुसाफिर ही मेरा परिवार हैं। मैं सालों से इसी घर में बैठी लोगों के लौट आने का रास्ता देखती हूँ।"

करण को बहुत गहरी नींद आने लगी। बूढ़ी माँ ने उसे एक भारी सा गर्म कंबल दिया और कमरे के कोने में सोने को कहा। करण जैसे ही सोया, उसे इतनी गहरी और सुकून भरी नींद आई, जैसी उसे पहले कभी नहीं आई थी।

अगली सुबह जब करण की आँखें खुलीं, तो उसके चेहरे पर ठंडी धूप की किरणें पड़ रही थीं। उसने चौंककर चारों तरफ देखा। वहाँ न तो कोई अंगीठी थी, न कोई गरम कंबल, और न ही वह लकड़ी का सुंदर कमरा था। वह एक पुरानी टूटी-फूटी हवेली के खंडहर के बीच सूखी घास पर लेटा हुआ था। उसकी मोटरसाइकिल पास ही खड़ी थी और बारिश थम चुकी थी। करण हैरान होकर उठा और खंडहर से बाहर आया।

जब वह पहाड़ी के नीचे गाँव के एक छोटे चाय के ढाबे पर पहुँचा, तो उसने ढाबे वाले को उस रहस्यमयी रात और पहाड़ी वाली बूढ़ी माँ के बारे में बताया। ढाबे के मालिक ने चाय के गिलास को चमकाते हुए गंभीर भाव से कहा, "बाबूजी, आप बहुत भाग्यशाली हैं। जिस लकड़ी के घर की बात आप कर रहे हैं, वह सत्तर साल पहले एक भूस्खलन में नष्ट हो गया था। वहाँ रहने वाली माँ सावित्री जी बहुत दयालु थीं और उन्होंने कई मुसाफिरों की जान बचाई थी। उनकी आत्मा आज भी उसी पहाड़ी पर भटकती है और डरावनी रातों में रास्ता भटके मुसाफिरों को शरण देती है। वे रामपुर की वरदान हैं।" यह सुनकर करण के रोंगटे खड़े हो गए। उसने पहाड़ी की तरफ मुड़कर देखा, जहाँ कोहरे के बीच धूप खिल रही थी। उसने हाथ जोड़कर उस रहस्यमयी रक्षक माँ सावित्री को मन ही मन धन्यवाद दिया।

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