यह कहानी है सविता और उसके छोटे से परिवार की। सविता के पति मदन लाल शहर की एक चीनी मिल में एक साधारण मज़दूर थे। वे बहुत सीधे और कर्मठ व्यक्ति थे, लेकिन चीनी मिल के अचानक बंद हो जाने के कारण उनका परिवार भारी संकट में घिर गया। मदन लाल बेरोज़गार हो गए और घर की बचत धीरे-धीरे ख़त्म होने लगी। एक समय ऐसा आया जब घर में बच्चों की स्कूल की फीस तो दूर, शाम की रसोई के अनाज के लिए भी पैसे नहीं बचे थे। मदन लाल अत्यधिक अवसाद में चले गए और उन्होंने काम की तलाश छोड़ दी। उन्हें लगने लगा कि उनका भाग्य ही खराब है।
ऐसी भयानक और निराशाजनक परिस्थितियों में सविता ने हार मानने से इंकार कर दिया। वह एक बहुत ही सकारात्मक और जुझारू महिला थी। उसका मानना था कि "विपत्ति चाहे कितनी भी कठिन और अंधेरी क्यों न हो, यदि हमारे मन में सकारात्मकता और उम्मीद की एक छोटी सी लौ जल रही है, तो अंधकार टिक नहीं सकता।" उसने अपने पति को ढांढस बंधाया और कहा, "आप घबराइए मत। हाथ-पैर सलामत हैं, तो हम मेहनत करके दोबारा खड़े होंगे। मैं भी आपके साथ काम करूँगी।"
सविता को सिलाई-कढ़ाई का अच्छा ज्ञान था। उसने गाँव की अन्य महिलाओं से संपर्क किया और उनके पुराने फटे-पुराने सूती कपड़ों और साड़ियों को इकट्ठा किया। उसने अपनी पुरानी हाथ से चलने वाली सिलाई मशीन पर बैठकर उन साड़ियों से बेहद सुंदर पैचवर्क वाले थैले, पायदान, चादरें और सजावटी सामान बनाना शुरू किया। वह पूरी-पूरी रात काम करती थी। उसकी आँखों में केवल एक ही सपना था कि बच्चों की पढ़ाई बीच में न छूटे और उसके पति दोबारा हौसला जुटा सकें।
सविता ने उन हस्तनिर्मित सामानों को लेकर नज़दीकी शहर के साप्ताहिक बाज़ार में बेचना शुरू किया। लोगों को उसके द्वारा बनाए गए थैले और चादरों की कला और नवीनता बहुत पसंद आई। पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण शहर के एक बड़े स्टोर के मालिक ने उसे एक बड़ा ऑर्डर दिया। सविता के पास अब काम की कोई कमी नहीं थी। उसने गाँव की अन्य गरीब और असहाय महिलाओं को भी जोड़ लिया और उन्हें रोज़गार दिया।
सविता की इस अटूट लगन और सफलता को देखकर मदन लाल के भीतर का स्वाभिमान और पुरुषार्थ पुनर्जीवित हो उठा। वे भी सविता की इस लघु उद्योग की मुहिम में हाथ बंटाने लगे। उन्होंने व्यापार के लेखा-जोखा और माल की आपूर्ति की जिम्मेदारी संभाल ली। परिवार की गरीबी अब दूर हो चुकी थी। बच्चों की स्कूल की फीस भर दी गई और घर में फिर से खुशहाली की रौनक लौट आई।
एक शाम जब मदन लाल और सविता अपने सुंदर घर के आंगन में बैठकर चाय पी रहे थे, मदन लाल की आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। उन्होंने सविता से कहा, "सविता, जब मैं टूटकर अंधेरे में खो चुका था, तब तुमने अपनी सकारात्मकता से हमारा हाथ थाम रखा। यदि तुम हिम्मत हार देतीं, तो आज हमारा परिवार बिखर चुका होता।" सविता ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने कुछ नहीं किया। जब रात सबसे गहरी होती है, तभी सुबह की पहली किरण फूटती है। हमें बस ईश्वर पर श्रद्धा रखकर उम्मीद की लौ को हमेशा जलाए रखना होता है।" सविता की इस अद्भुत यात्रा ने रामपुर गाँव की सैकड़ों महिलाओं को उद्यमशीलता और आत्मनिर्भरता की एक नई प्रेरणा दी।