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हास्य का पिटारा
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हास्य का पिटारा

✍️ Aakash Sharma
April 1, 2024
3 min read

भारतीय शादियाँ वैसे तो बहुत ही खूबसूरत होती हैं, लेकिन रामपुर गाँव के शर्मा जी के बेटे "पिंटू" की शादी जैसी शादी पूरे ज़िले में कभी किसी ने नहीं देखी थी। पिंटू की शादी में होने वाली मज़ेदार गलतफहमियाँ इतनी अतरंगी थीं कि शहनाई की धुन से ज़्यादा मेहमानों के ठहाकों की आवाज़ गूंज रही थी। शुरूआत वरमाला के रस्म से हुई, जहाँ दोनों पक्षों के बीच कड़ा मुकाबला चल रहा था।

दुल्हे पिंटू के फूफा जी, जिनका नाम गजानन था, अपने स्वाभिमानी और कड़क स्वभाव के लिए जाने जाते थे। गजानन फूफा जी को शादी में पनीर की सब्जी परोसा जाना बहुत पसंद था और वे सुबह से ही रसोइया के पास खड़े होकर पनीर की निगरानी कर रहे थे। उधर दुल्हन की बूढ़ी दादी अम्मा बहुत कम सुनती थीं, लेकिन उन्हें हर बात की पंचायत करने की आदत थी।

वरमाला के लिए जैसे ही दुल्हा स्टेज पर पहुँचा, स्टेज के ऊपर की सुंदर फूलों की नक्काशी गिर पड़ी। पिंटू की शेरवानी पर ढेर सारे पत्ते चिपक गए। पिंटू अपनी शेरवानी साफ करने के लिए जैसे ही झुका, तभी दुल्हन के चचेरे भाइयों ने मजाक में पिंटू को गोद में उठा लिया। दुल्हे के दोस्तों ने सोचा कि दुल्हन पक्ष वाले पिंटू को नीचे गिराना चाहते हैं। उन्होंने तुरंत मुकाबले के लिए दुल्हन को भी हवा में उठा लिया। दोनों पक्ष एक-दूसरे से मुकाबला करने लगे। इस धक्का-मुक्की में वरमाला दुल्हे के गले में पड़ने के बजाय सीधे मुख्य अतिथि दरोगा जी के सिर पर जाकर गिर गई। दरोगा जी ने चौंककर अपनी मूंछें ताव दीं, जिससे मेहमानों के बीच अजीब सा सन्नाटा और फिर ज़ोरदार हँसी फैल गई।

तभी बारात के भोजन पंडाल से घबराहट भरी खबर आई। गजानन फूफा जी लाल-पीले होकर मुख्य मंडप की तरफ आ रहे थे। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "ये रामपुर की बारात है या मज़ाक है? पनीर की सब्जी में केवल आलू ही आलू तैर रहे हैं! हमें अपमानित किया गया है!" दुल्हन के पिता घबरा गए और उन्होंने रसोइए से पूछा। रसोइए ने बताया, "साहब, आलू की कड़ाही अलग थी और पनीर की कड़ाही अलग थी, लेकिन फूफा जी के चश्मे का नंबर गलत होने की वजह से उन्होंने आलू वाले भगोने को ही पनीर समझ लिया और हंगामा खड़ा कर दिया।"

इस बीच, पंडित जी ने फेरों की तैयारी शुरू की। फेरों के समय जब गठजोड़ बांधने की बारी आई, तो दुल्हन की दादी अम्मा आगे बढ़ीं। उन्होंने कम सुना था, इसलिए पंडित जी ने जब कहा, "दुल्हे की बहन को बुलाओ, गठजोड़ बांधेगी।" तो दादी अम्मा ने सुना, "दुल्हे के साथ बंधन बाँधो।" दादी अम्मा ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू पिंटू की शेरवानी से बांध दिया और स्वयं फेरों के लिए खड़ी हो गईं। बारात के लोग ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। पिंटू ने कहा, "दादी माँ, शादी आपसे नहीं, आपकी पोती से हो रही है!" दादी माँ ने खिलखिलाकर कहा, "अरे बेटा, मुझे लगा पंडित मेरे पुराने दिनों की याद ताज़ा कर रहा है।"

हँसी-मज़ाक के इन अतरंगी वाकयों के बाद पिंटू और मीरा की शादी बहुत ही शांतिपूर्वक और आनंदमय माहौल में पूरी हुई। विदाई के समय जब सब रो रहे थे, तभी गजानन फूफा जी को रसोइया ने असली मलाई-पनीर कड़ाही का बड़ा कटोरा भेंट किया। फूफा जी ने पनीर की कटी हुई टुकड़ी को देखकर रोना बंद किया और कहा, "चलो, शादी तो सफल रही।" पिंटू और मीरा की शादी रामपुर गाँव के इतिहास में "हास्य का असली पिटारा" बन गई, जिसने सब को सिखाया की ज़िंदगी के इस बड़े त्योहार में तनाव लेने के बजाय हँसी-खुशी से रहना ही असली आनंद है।