नेहा रामपुर गाँव की पहली ऐसी लड़की थी जिसने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर शहर के सबसे बड़े विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.एड (शिक्षक प्रशिक्षण) की डिग्री हासिल की थी। नेहा के माता-पिता अत्यंत साधारण किसान थे, लेकिन उन्होंने समाज के तानों को सहकर भी अपनी बेटी को खूब पढ़ाया-लिखाया। गाँव के जमींदार और अन्य लोग नेहा को शहर में ही रहकर कोई बड़ी नौकरी करने की सलाह दे रहे थे। उनका विचार था कि नेहा को शहर के बड़े स्कूलों में पढ़ाना चाहिए जहाँ उसे ऊंचे वेतन और ऐशो-आराम मिल सके।
लेकिन नेहा का दिल अपने गाँव के उन मासूम बच्चों के लिए धड़कता था जो बुनियादी शिक्षा से भी वंचित थे। रामपुर गाँव में केवल एक जर्जर सरकारी स्कूल था, जहाँ न तो शिक्षक नियमित आते थे और न ही पढ़ने की कोई सामग्री उपलब्ध थी। गाँव की अधिकांश लड़कियाँ केवल घरेलू कामों में लगी रहती थीं और उनका जीवन बहुत संकीर्ण दायरे में सीमित था। नेहा ने तय किया कि वह अपनी डिग्री और ज्ञान का उपयोग अपने गाँव के विकास के लिए करेगी। उसने शहर की बड़ी नौकरी के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया और गाँव लौट आई।
गाँव लौटकर नेहा ने अपने पुराने जर्जर स्कूल को पुनर्जीवित करने का फैसला किया। उसने गाँव के चौपाल पर सरपंच जी और बुजुर्गों के साथ बैठक की। उसने कहा, "मैं हमारे गाँव के बच्चों के लिए सुबह और शाम को मुफ़्त कोचिंग और बुनियादी शिक्षा की कक्षाएं शुरू करना चाहती हूँ। इसके लिए मुझे किसी बड़े बजट की ज़रूरत नहीं है, बस मुझे मंदिर के पास वाले खाली पड़े शेड का उपयोग करने की अनुमति दी जाए।" शुरू में गाँव के कुछ लोगों ने विरोध किया कि "लड़कियों को पढ़ाने से गाँव का माहौल बिगड़ेगा," लेकिन नेहा के माता-पिता और सरपंच जी ने उसका पूर्ण समर्थन किया।
नेहा ने अपनी कक्षाएं शुरू कीं। वह बच्चों को केवल किताबों की बातें नहीं पढ़ाती थी, बल्कि खेल-कूद, चित्रकला, विज्ञान के प्रयोग और नैतिक मूल्य भी सिखाती थी। वह लड़कियों के माता-पिता से व्यक्तिगत रूप से मिलने जाती थी और उन्हें समझाती थी कि बेटियों को शिक्षित करना परिवार की उन्नति के लिए कितना आवश्यक है। धीरे-धीरे स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। उसने गाँव के युवाओं को भी इस मुहिम से जोड़ा, जिससे गाँव में साक्षरता के प्रति एक नई अलख जग गई।
नेहा की लगन को देखकर ज़िला शिक्षा अधिकारी भी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने रामपुर गाँव के सरकारी स्कूल के पुनर्निर्माण के लिए सरकारी अनुदान स्वीकृत कर दिया और नेहा को उस स्कूल की मुख्य शिक्षिका नियुक्त किया। कुछ ही वर्षों में रामपुर गाँव का वह जर्जर स्कूल जिले के सर्वश्रेष्ठ आदर्श स्कूलों में से एक बन गया। गाँव की कई लड़कियाँ अब कॉलेज जाने लगी थीं और उच्च पदों के सपने देखने लगी थीं।
नेहा ने साबित कर दिया कि असली देश-सेवा और समाज का विकास केवल शहरों में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं होता, बल्कि अपने गाँव की जड़ों से जुड़कर वहाँ की मिट्टी को सोने जैसा बनाने से होता है। रामपुर गाँव के लोगों को आज नेहा पर बहुत गर्व था, और वे उसे "गाँव की बेटी" कहकर बुलाते थे जिसने अंधकार और अशिक्षा के दलदल से उनके बच्चों को निकालकर ज्ञान और उम्मीद का एक नया सवेरा दिखाया।