दिनेश शहर के एक बहुत बड़े बैंक में कार्यरत था। वह बहुत ही जिद्दी, महत्वाकांक्षी और गुस्सैल स्वभाव का व्यक्ति था। उसका मानना था कि वह दिन-भर काम करके घर के लिए जो पैसा लाता है, वही उसका सबसे बड़ा योगदान है। उसकी पत्नी मीरा एक बहुत ही घरेलू, शांत और मुस्कुराने वाली महिला थी। मीरा सुबह पाँच बजे उठती, पूरे घर की सफ़ाई करती, दिनेश के लिए मनपसंद नाश्ता और टिफिन बनाती, बच्चों को स्कूल भेजती और पूरे दिन घर के काम संभालती थी। लेकिन दिनेश ने कभी मीरा के इस काम की सराहना नहीं की। वह अक्सर मीरा पर चिल्ला पड़ता था और कहता था, "तुम पूरे दिन घर में करती ही क्या हो? असली मेहनत तो मैं करता हूँ।"
मीरा कभी दिनेश की बात का बुरा नहीं मानती थी; वह केवल मुस्कुरा देती थी। उसका मानना था कि उसका परिवार ही उसकी दुनिया है और उनकी सेवा करना उसका परम धर्म है। वह अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करती थी और जब भी उसे थकान या हल्का दर्द होता, वह किसी से कुछ नहीं कहती थी। वह सोचती थी कि उसके कारण घर के बाकी लोग परेशान न हों।
एक दिन शाम को जब दिनेश काम से घर लौटा, तो उसने देखा कि घर का दरवाज़ा बंद था और चारों तरफ अजीब सा सन्नाटा था। आम तौर पर मीरा दरवाज़ा खोलते ही पानी का गिलास लेकर खड़ी रहती थी। दिनेश गुस्से में अंदर गया और उसने मीरा को आवाज़ दी। उसने देखा कि मीरा बिस्तर पर बेसुध लेटी हुई थी। उसका शरीर तेज बुखार से तप रहा था और वह सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रही थी। दिनेश घबरा गया। उसने तुरंत डॉक्टर को बुलाया और मीरा को अस्पताल में भर्ती करवाया।
डॉक्टर ने गहन जाँच के बाद बताया कि मीरा को बहुत गंभीर संक्रमण हुआ था और वह लंबे समय से अत्यधिक थकान और शारीरिक कमज़ोरी से गुज़र रही थी। डॉक्टर ने कहा, "दिनेश जी, आपकी पत्नी ने अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया और वे लगातार बिना आराम किए काम कर रही थीं। यदि इन्हें चौबीस घंटे के भीतर सही उपचार नहीं मिलता, तो उनकी जान भी जा सकती थी।" डॉक्टर की यह बात सुनकर दिनेश के पाँव तले से ज़मीन खिसक गई।
अगले तीन दिनों तक दिनेश अस्पताल की बेंच पर बैठा रहा। इन तीन दिनों में उसे समझ आया कि मीरा के बिना उसकी और उसके बच्चों की ज़िंदगी कितनी बिखर चुकी थी। घर में न तो समय पर खाना बन पा रहा था, न बच्चों के कपड़े मिल रहे थे और न ही उसे कोई तसल्ली देने वाला था। दिनेश को अपनी पुरानी बातें और मीरा के प्रति किया गया रूखा व्यवहार याद आने लगा। उसने भगवान से प्रार्थना की, "हे भगवान! मेरी मीरा को ठीक कर दो। मैं वादा करता हूँ कि मैं उसे कभी दुखी नहीं करूँगा।"
चौथे दिन मीरा को होश आया। जब उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने देखा कि दिनेश उसके पास बैठा हुआ था। दिनेश की आँखों में पश्चाताप के आँसू थे। उसने मीरा का हाथ अपने माथे से लगा लिया और रोते हुए कहा, "मीरा, मुझे माफ़ कर दो। मैं हमेशा सोचता था कि गृहस्थी चलाना बहुत आसान है, लेकिन आज मुझे तुम्हारी अहमियत का अंदाज़ा हुआ है। तुम इस घर की आत्मा हो मीरा। तुम्हारे प्यार और त्याग के बिना यह घर केवल पत्थरों का ढांचा है।" मीरा ने दिनेश के चेहरे से आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, "आप रोइए मत। आप ठीक हैं तो मैं भी बिल्कुल ठीक हूँ।" दिनेश को इस बीमारी के ज़रिए मीरा के निस्वार्थ और असीम प्रेम की गहराई का एहसास हुआ। वह अब पूरी तरह बदल चुका था और मीरा के साथ मिलकर घर और जीवन के हर सुंदर पल का आनंद ले रहा था।