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prerna

डॉक्टर साहब

December 10, 2024
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सुरेश एक भूमिहीन गरीब मज़दूर का बेटा था। घर में दो वक्त के भोजन की भी बड़ी कठिनाई थी। सुरेश के पिता सुबह से शाम तक दूसरों के खेतों पर पसीना बहाते थे ताकि अपने परिवार का पेट पाल सकें। इस तंगहाली के बावजूद, सुरेश की आँखों में एक बहुत बड़ा और पवित्र सपना था—वह एक डॉक्टर बनना चाहता था। गाँव में जब कोई बीमार होता, तो इलाज के अभाव में तड़प-तड़पकर जान दे देता था। सुरेश बचपन में अपनी छोटी बहन को इलाज न मिलने के कारण खो चुका था। उसी दिन उसने प्रण लिया था कि वह बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा और गाँव के गरीबों का मुफ्त इलाज करेगा।

सरकारी स्कूल के मास्टर जी मदन लाल जी सुरेश की प्रतिभा और लगन से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने देखा कि सुरेश रात में सड़क की बत्ती की रोशनी में बैठकर पूरी तन्मयता से पढ़ता था। उसकी आँखों में कुछ करने का एक प्रबल जुनून था। मदन लाल जी ने सुरेश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसे पुरानी किताबें लाकर दीं और स्कूल के बाद उसे बिना किसी फीस के अपने घर पर पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने सुरेश से कहा, "सुरेश, गरीबी तुम्हारी सफलता के आड़े नहीं आ सकती, बशर्ते तुम्हारी मेहनत और संकल्प में सच्चाई हो। तुम बस पढ़ाई पर ध्यान दो, पैसों की चिंता मत करो।"

सुरेश ने बारहवीं की बोर्ड परीक्षा पूरे राज्य में सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण की। अब उसे मेडिकल राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा (नीट) की तैयारी करनी थी। इसके लिए महंगी कोचिंग और किताबों की ज़रूरत थी। सुरेश के पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। मदन लाल जी आगे आए। उन्होंने अपनी जीवन भर की जमापूंजी का एक बड़ा हिस्सा सुरेश की कोचिंग और फॉर्म भरने के लिए दे दिया। उन्होंने गाँव के कुछ अन्य लोगों से भी बात की और सुरेश के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था की।

सुरेश ने अपने गुरु और माता-पिता के भरोसे को टूटने नहीं दिया। उसने दिन-रात पढ़ाई की और पहली ही बार में देश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पा लिया। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान भी उसने अपनी सादगी और विनम्रता को कभी नहीं खोया। वह हमेशा अपनी बहन की याद और गाँव के लोगों की लाचारी को अपने मन में जीवित रखता था। पाँच साल की कठिन साधना के बाद, सुरेश अंततः डॉ. सुरेश बन गया।

कॉलेज से पास आउट होने के बाद, उसके सहपाठियों ने बड़े शहरों और प्रसिद्ध अस्पतालों में लाखों के पैकेज वाली नौकरियां स्वीकार कीं। लेकिन डॉ. सुरेश ने अपने गाँव लौटने का फैसला किया। उसने गाँव में एक छोटा सा अस्पताल खोला, जिसका नाम उसने 'मदन लाल सेवा केंद्र' रखा। वह गाँव के गरीबों का बिल्कुल मुफ्त इलाज करता था और अपने गुरु मदन लाल जी के सपनों को साकार कर रहा था। गाँव के लोगों के लिए वह कोई साधारण इंसान नहीं था; वे उसे साक्षात ईश्वर का रूप मानते थे।

एक दिन मदन लाल जी बीमार पड़े तो डॉ. सुरेश ने स्वयं उनका इलाज किया। मदन लाल जी ने नम आँखों से सुरेश के सिर पर हाथ रखा और कहा, "सुरेश, आज मेरी जीवन भर की तपस्या सफल हो गई। तुमने साबित कर दिया कि एक सच्चा डॉक्टर वही है जो पैसे के पीछे भागने के बजाय इंसानी दर्द को समझता है। मुझे तुम पर गर्व है डॉक्टर साहब।" सुरेश ने मुस्कुराते हुए अपने गुरु के चरण स्पर्श किए। उसकी इस महान यात्रा ने रामपुर गाँव को हमेशा के लिए एक स्वस्थ और सुखी गाँव बना दिया।

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