हर साल गर्मी की छुट्टियों में राघव और उसकी छोटी बहन पीहू अपनी नानी के घर जाया करते थे। नानी का घर गाँव में था, जहाँ चारों तरफ हरियाली, मीठे पानी के कुएं और पेड़ों पर झूलते झूले थे। नानी के घर की सबसे पसंदीदा बात थी रात का समय, जब आकाश में टिमटिमाते तारों के नीचे नानी सभी बच्चों को आंगन में दरी बिछाकर बिठा लेती थीं और एक से बढ़कर एक जादुई और ज्ञानवर्धक कहानियाँ सुनाती थीं। नानी की कहानियों की कला इतनी जादुई थी कि बच्चे मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहते थे।
इस बार राघव और पीहू एक नई जिद लेकर आए थे। राघव ने कहा, "नानी, पुरानी राजा-रानी की कहानियाँ तो बहुत सुन लीं। आज हमें कोई ऐसी कहानी सुनाओ जो बिल्कुल अलग हो और जिसमें असली जादू छिपा हो।" नानी मुस्कुराईं, उन्होंने अपनी ऐनक ठीक की और कहा, "ठीक है बच्चों। आज मैं तुम्हें मेरी नानी द्वारा मुझे सुनाई गई एक बहुत पुरानी कहानी सुनाती हूँ। यह कहानी है 'न्याय के जादुई पत्थर' की।"
"बहुत समय पहले, सुंदरगढ़ नाम के एक अत्यंत समृद्ध राज्य में वीरसेन नाम के एक बहुत ही दयालु राजा राज करते थे। उनके राज्य के मध्य में एक पहाड़ी पर एक बड़ा जादुई पत्थर था, जिसे 'सत्य शिला' कहा जाता था। उस पत्थर की विशेषता यह थी कि यदि कोई झूठा व्यक्ति उसे छूता, तो वह पत्थर काला पड़ जाता था और यदि कोई सच्चा और ईमानदार व्यक्ति उसे छूता, तो वह पत्थर सोने की तरह चमकने लगता था। पूरे राज्य के लोग उस पत्थर का बहुत सम्मान करते थे और कोई भी झूठ बोलने की हिम्मत नहीं करता था।"
नानी ने आगे कहा, "एक बार राज्य के दो व्यापारियों में एक कीमती हीरे को लेकर बहुत बड़ा विवाद हो गया। एक व्यापारी कहता था कि हीरा उसका है, और दूसरा कहता था कि हीरा उसने ख़रीदा है। मामला राजा की अदालत में पहुँचा। राजा ने कहा कि तुम दोनों को सत्य शिला को छूना होगा। जो झूठा होगा, उसका झूठ सबके सामने आ जाएगा। पहला व्यापारी बहुत शांत और प्रसन्न था, लेकिन दूसरा व्यापारी अंदर से थोड़ा डरा हुआ था। उसने रात में गुप्त रूप से पहाड़ी पर जाकर उस जादुई पत्थर को सोने के रंग से रंगने की योजना बनाई ताकि उसका झूठ पकड़ा न जाए।"
"अगली सुबह जब दोनों व्यापारी राजा और पूरी प्रजा के सामने पहाड़ी पर पहुँचे, तो राजा ने पहले व्यापारी को पत्थर छूने को कहा। जैसे ही उसने छुआ, पत्थर से तेज सुनहरी किरणें बह निकलीं। जब दूसरे व्यापारी की बारी आई, तो वह कांपते पैरों से आगे बढ़ा और जैसे ही उसने पत्थर को छुआ, पत्थर काला नहीं पड़ा बल्कि सोने का रंग उसके हाथ पर चिपक गया और पत्थर का असली रूप बाहर आ गया। पत्थर ने कोई रासायनिक जादू नहीं किया, बल्कि झूठे व्यक्ति के अपने हाथों की चालाकी ने उसका सच सबके सामने ला दिया। राजा ने उसे तुरंत दंडित किया और हीरे को उसके असली मालिक को सौंप दिया।"
नानी ने राघव और पीहू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "तो बच्चों, इस कहानी का असली जादू क्या था? असली जादू पत्थर में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की अंतरात्मा में था। जब हम कोई गलत काम या झूठ बोलते हैं, तो हमारी अंतरात्मा पहले ही जान लेती है और हमारा डर ही हमारा सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है। ईमानदारी और सच्चाई का मार्ग सबसे सुरक्षित और चमकदार मार्ग है।" राघव और पीहू ने अपनी नानी को गले लगा लिया और वादा किया कि वे जीवन में कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेंगे। नानी की वह जादुई कहानी उनके दिलों में हमेशा के लिए बैठ गई।