रामेश्वर जी एक बहुत ही कड़क और पुराने विचारों के व्यक्ति थे, जो अनुशासन को सर्वोपरि मानते थे। उनका इकलौता पुत्र विवेक आधुनिक विचारों का लड़का था, जो अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहता था। दोनों का स्वभाव बहुत ही मिलता-जुलता था—वे दोनों ही अत्यधिक स्वाभिमानी और अहंकारी थे। जब विवेक ने अपनी नौकरी और भविष्य के फैसलों में पिता की मर्ज़ी के बिना कदम उठाया, तो रामेश्वर जी ने गुस्से में कहा, "यदि तुम्हें मेरी सलाह की कोई ज़रूरत नहीं है, तो इस घर में भी रहने का तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।" विवेक ने भी गुस्से में कहा, "मैं अपनी काबिलियत पर अपने दम पर जीकर दिखाऊंगा।" वह रात ही घर छोड़कर शहर चला गया।
पाँच साल बीत गए। पिता और पुत्र में कोई संवाद नहीं हुआ। विवेक ने शहर में बड़ी सफलता प्राप्त की, लेकिन उसने कभी पिता से संपर्क नहीं किया। रामेश्वर जी भी अपने क्रोध और झूठे स्वाभिमान में जमे रहे। जब भी विवेक की माँ कल्याणी जी विवेक से बात करने की कोशिश करतीं, रामेश्वर जी उन्हें डांट देते थे। इन दोनों के इस मूक युद्ध में कल्याणी जी सबसे ज़्यादा पिसी जा रही थीं। उनका मातृत्व अपने बेटे को देखने के लिए प्यासा था और उनकी तबीयत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी।
कल्याणी जी को अंततः कैंसर का पता चला। डॉक्टर ने कहा कि उनके पास बहुत कम समय बचा है। विवेक को जब यह बात पता चली, तो वह सब कुछ छोड़कर तुरंत अपनी माँ के पास पहुँचा। कल्याणी जी अस्पताल के बेड पर बहुत कमज़ोर अवस्था में थीं। जब कल्याणी जी ने विवेक को देखा, तो उनके मुरझाए चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आई। उन्होंने विवेक का हाथ पकड़ लिया। तभी कमरे में रामेश्वर जी ने प्रवेश किया। विवेक और रामेश्वर जी की आँखें आपस में मिलीं, लेकिन दोनों ने ही अपना मुँह फेर लिया। अहंकार की अदृश्य दीवार अभी भी वैसे ही खड़ी थी।
कल्याणी जी ने अपने कमजोर स्वर में रामेश्वर जी और विवेक दोनों को अपने पास बुलाया। उन्होंने दोनों का हाथ अपने हाथ में लिया और दोनों हथेलियों को आपस में मिला दिया। उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, "मेरा जाना तय है। मैं स्वर्ग में तभी सुकून से रह पाऊंगी जब मेरी आँखों के सामने मेरे जीवन के दो सबसे प्यारे इंसान अपने इस झूठे अहंकार को छोड़ देंगे। रामेश्वर जी, आपका बेटा कोई दुश्मन नहीं है। और विवेक, तुम्हारे पिता ने तुम्हें हमेशा प्यार किया है, बस उनका तरीका अलग था। क्या तुम दोनों मेरी आखिरी इच्छा के लिए इस दीवार को नहीं तोड़ सकते?"
कल्याणी जी के इन शब्दों ने दोनों के दिलों को झकझोर दिया। रामेश्वर जी ने विवेक की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक लाचार पिता का रोता हुआ मन था। विवेक ने पिता के चेहरे पर बढ़ती झुर्रियों और उनकी कांपती हुई देह को देखा। वह समझ गया कि उसका क्रोध कितना निरर्थक था। विवेक घुटनों के बल बैठ गया और उसने अपने पिता के पैर पकड़ लिए। रामेश्वर जी ने खुद को रोक नहीं पाया। उन्होंने विवेक को ऊपर उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
कमरे का पूरा वातावरण भावुक हो गया। माँ कल्याणी के चेहरे पर एक परम संतोष का भाव था। यद्यपि कुछ दिनों बाद कल्याणी जी इस दुनिया से विदा हो गईं, लेकिन वे अपने पीछे एक टूटा हुआ नहीं, बल्कि एक संयुक्त परिवार छोड़ गईं। विवेक ने अब अपने पिता के साथ गाँव में ही रहने का फैसला किया। उन्होंने समझ लिया था कि रिश्तों में कभी-कभी हार जाना ही सबसे बड़ी जीत होती है और अपनों के सामने झुकने से स्वाभिमान टूटता नहीं, बल्कि और मज़बूत होता है।