हरिप्रसाद जी अपने पुराने पैतृक घर में अपनी पत्नी देविका के साथ रहते थे। उनके दो बेटे थे—अमित और सुमित। अमित बड़ा बेटा था, जो शादी के बाद शहर जाकर बस गया था, और सुमित छोटा था, जो अपने व्यवसाय के सिलसिले में दूसरे राज्य में रहता था। पाँच साल पहले, एक मामूली ज़मीन के विवाद और संपत्ति के बँटवारे को लेकर दोनों भाइयों के बीच भारी विवाद हुआ था। वह विवाद इतना बढ़ गया था कि दोनों भाइयों ने एक-दूसरे का चेहरा न देखने की कसम खाई थी। हरिप्रसाद जी और देविका जी ने दोनों बेटों को बहुत समझाने की कोशिश की थी, लेकिन युवा खून और अहंकार के आगे कड़वाहट गहरी होती चली गई।
पाँच सालों से हरिप्रसाद जी का घर दिवाली पर पूरी तरह सूना रहता था। देविका जी दिवाली की पूजा के समय दोनों बेटों की तस्वीरों को देखकर रोती थीं जहाँ कल तक खुशियाँ बिखरी रहती थीं। इस साल हरिप्रसाद जी ने एक गुप्त योजना बनाई। वे अब बूढ़े हो चुके थे और जानते थे कि ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं है। वे चाहते थे कि उनके मरने से पहले उनका परिवार एक बार फिर एकजुट हो जाए और घर में पहले जैसी हँसी-खुशी गूंज उठे।
दिवाली से दस दिन पहले, हरिप्रसाद जी ने अमित और सुमित दोनों को अलग-अलग पत्र लिखे। उन्होंने अमित को लिखा कि "सुमित बहुत बीमार है और वह आखिरी बार तुमसे मिलना चाहता है।" और सुमित को लिखा कि "अमित बहुत बड़ी मुसीबत में है और उसे तुरंत मदद की ज़रूरत है।" दोनों पत्रों में उन्होंने दिवाली की शाम को घर पहुँचने के लिए कहा। दोनों भाई लाख कड़वाहट और अहंकार के बावजूद अपने दिल के किसी कोने में भाईचारे का दबे हुए एहसास को दबा नहीं पाए। दोनों ही चिंतित हो गए और उन्होंने तुरंत गाँव की ट्रेन पकड़ी।
दिवाली की शाम को पूरा घर दीयों से सजा हुआ था। हरिप्रसाद जी और देविका जी मुख्य द्वार के पास उत्सुकता से खड़े थे। अचानक अमित अपनी गाड़ी से उतरा। ठीक उसी समय सुमित भी एक ऑटो से उतरा। दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा। कड़वाहट की जगह चेहरे पर चिंता के भाव थे। अमित ने सुमित से पूछा, "सुमित! तुम्हारी तबीयत कैसी है? पापा ने लिखा था कि तुम ठीक नहीं हो।" सुमित ने हैरान होकर कहा, "भैया, मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे तो पापा ने लिखा था कि आप बहुत बड़ी मुसीबत में हैं।"
वे दोनों मुड़े और अपने पिता हरिप्रसाद जी की तरफ देखा। हरिप्रसाद जी आँखों में आँसू लिए मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा, "हाँ मेरे बच्चों, मैंने तुम दोनों से झूठ बोला था। सुमित बीमार नहीं है और अमित मुसीबत में नहीं है। मुसीबत में तो हमारा यह घर और हमारे यह टूटे हुए रिश्ते हैं। अगर मैं ऐसा नहीं करता, तो तुम कभी इस देहरी पर कदम नहीं रखते। क्या तुम दोनों अपने पुराने विवाद को अपने माता-पिता के प्यार से भी बड़ा समझते हो? क्या इस दिवाली पर हमारे दिलों की कड़वाहट दूर नहीं हो सकती?"
अमित और सुमित ने एक-दूसरे को देखा। उनका अहंकार पिघल चुका था। दोनों भाइयों की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। वे आगे बढ़े और एक-दूसरे को गले से लगा लिया। पाँच साल की कड़वाहट और दीवारें कुछ ही सेकंड के आलिंगन में बह गईं। देविका जी ने आगे बढ़कर दोनों बेटों को आरती उतारी और उन्हें घर के भीतर ले गईं। उस रात पूरा गाँव गवाह था कि हरिप्रसाद जी के घर में सिर्फ मिट्टी के दीये ही नहीं जले थे, बल्कि प्रेम, भाईचारे और परिवार की सच्ची रोशनी जगमगाई थी।