कोमल एक छोटे से गाँव की रहने वाली थी, जहाँ लड़कियों की पढ़ाई को बहुत महत्व नहीं दिया जाता था। अक्सर लड़कियों की शादी सोलह या सत्रह साल की उम्र में ही कर दी जाती थी। लेकिन कोमल के सपने बड़े थे। जब भी आसमान में कोई हवाई जहाज़ उड़ता, कोमल उसे घंटो देखती रहती और अपने पिता महिपाल से कहती, "पापा, एक दिन मैं भी इस हवाई जहाज़ को आसमान में उड़ाऊंगी और बादलों को छूकर दिखाऊंगी।" महिपाल गाँव के एक छोटे से स्कूल में चपरासी का काम करते थे। उनकी आमदनी बहुत ही सीमित थी, लेकिन अपनी बेटी की आँखों में उड़ने का सपना देखकर उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था।
महिपाल ने निश्चय किया कि वे अपनी बेटी को पढ़ाएंगे, चाहे इसके उन्हें दिन-रात मेहनत ही क्यों न करनी पड़े। कोमल पढ़ाई में गजब की होनहार थी। उसने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में अपने पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अब बारी थी पायलट की ट्रेनिंग के कोर्स में प्रवेश लेने की। इसकी फीस लाखों रुपये थी, जो महिपाल के जीवन भर की कमाई से भी बहुत अधिक थी। जब महिपाल ने गाँव के लोगों से मदद मांगी, तो सबने उसका मज़ाक उड़ाया, "चपरासी की बेटी और पायलट बनेगी? महिपाल पगला गए हो क्या? लड़कियों की शादी कर दो, यही बहुत है।"
इन तानों से महिपाल का हौसला टूटा नहीं, बल्कि और दृढ़ हो गया। उन्होंने अपनी पुस्तैनी छोटी सी ज़मीन का टुकड़ा बेच दिया और शहर के बैंकों के चक्कर लगाए। कोमल की असाधारण प्रतिभा और बारहवीं के अंको को देखकर एक उदार बैंक मैनेजर ने उसे शिक्षा ऋण स्वीकृत कर दिया। महिपाल ने रात को अतिरिक्त गार्ड की नौकरी करना शुरू कर दिया ताकि वह बैंक की किश्तें भर सकें और कोमल के शहर में रहने का खर्च उठा सकें।
कोमल ने जब देखा कि उसके पिता उसके लिए अपनी रात की नींद और स्वाभिमान दांव पर लगा रहे हैं, तो उसने पूरी लगन और जुनून के साथ पढ़ाई की। विमानन अकादमी में वह सबसे होनहार छात्र थी। उसने उड़ान के सिमुलेटर टेस्ट और उड़ान की बारीकियों को बहुत जल्दी और कुशलता से सीख लिया। कई महीनों की कठिन परीक्षा और ट्रेनिंग के बाद, आखिरकार वह दिन आ ही गया जब कोमल को देश की एक बड़ी विमानन कंपनी में सह-पायलट के रूप में चुन लिया गया।
कोमल को उनकी पहली उड़ान के लिए वर्दी मिली, जिसमें प्रतिष्ठित बैज लगा हुआ था। उसने अपने पिता महिपाल को शहर बुलाया और उन्हें हवाई अड्डे का टिकट दिया। महिपाल जब हवाई अड्डे पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि उनकी बेटी एक बड़ी वर्दी पहने हुए आत्मविश्वास के साथ चल रही थी। यात्री और हवाई अड्डे के कर्मचारी भी उसे सम्मान दे रहे थे। कोमल ने अपने पिता को देखते ही उनके पैर छुए और अपना पायलट वाला चश्मा और टोपी अपने पिता के सिर पर रख दी।
महिपाल की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उनके पास शब्द नहीं थे, सिर्फ एक पिता का गर्व था जो आसमान छू रहा था। कोमल ने विमानन लाउडस्पीकर पर घोषणा की, "आज की इस उड़ान की सह-पायलट कोमल है, और इस विमान में मेरे सबसे खास मेहमान मेरे पिता महिपाल जी बैठे हैं, जिनके त्याग के बिना मेरी यह उड़ान असंभव थी।" पूरे विमान ने तालियों की गड़गड़ाहट से महिपाल का स्वागत किया। कोमल की कहानी ने सिद्ध कर दिया कि बेटियों के पंखों में बड़ी ताकत होती है, बस पिता के विश्वास के आसमान की ज़रूरत होती है।