माँ का आँचल
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रामेश शहर की एक बहुत बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत था। उसके पास आलीशान घर था, चमचमाती गाड़ी थी और समाज में एक बड़ा रुतबा था। लेकिन इस सब के बीच, वह अपनी बूढ़ी माँ पार्वती को भूल चुका था, जो गाँव के एक छोटे से कच्चे घर में अकेली रहती थी। रामेश के लिए काम और उसकी शहर की सामाजिक ज़िंदगी ही सब कुछ बन चुकी थी। वह महीनों तक अपनी माँ को फोन तक नहीं करता था, और जब माँ कभी खुद फोन करती, तो वह "मैं व्यस्त हूँ" कहकर बात टाल देता था।
गाँव में रहने वाली पार्वती जी का जीवन सिर्फ अपने बेटे की यादों के सहारे कट रहा था। उन्होंने बड़ी मुश्किलों से, दिन-रात मेहनत करके और दूसरों के खेतों में काम करके रामेश को पढ़ाया-लिखाया था। पार्वती की आँखों में केवल एक ही सपना था कि उनका बेटा सुखी रहे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि बेटा बड़ा होकर उन्हें ही अपनी व्यस्त दुनिया से बाहर कर देगा। वह अक्सर पुराने संदूक से रामेश के बचपन के खिलौने और कपड़े निकालकर रोया करती थीं। उनकी ममता कभी कम नहीं हुई, चाहे बेटे का व्यवहार कैसा भी रहा हो।
एक दिन अचानक रामेश के पास गाँव के एक पड़ोसी श्याम का फोन आया। श्याम ने घबराते हुए कहा, "रामेश भैया, तुम्हारी माँ की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब है। उन्हें तेज बुखार है और वह होश खो बैठी हैं। वह बार-बार तुम्हारा ही नाम पुकार रही हैं।" यह खबर सुनकर रामेश के दिल में एक अजीब सी हलचल मच गई। उसे अपने काम के बीच माँ की धुंधली सी याद आई। उसने तुरंत अपनी गाड़ी उठाई और गाँव की तरफ चल पड़ा।
रास्ते भर रामेश के दिमाग में पुराने दिन घूम रहे थे। उसे याद आ रहा था कि कैसे बचपन में जब उसे हल्का सा भी बुखार आता था, तो उसकी माँ पूरी रात जागकर उसके सिर पर पानी की ठंडी पट्टियाँ रखती थीं। माँ खुद भूखी सो जाती थी, लेकिन उसे हमेशा गर्म और स्वादिष्ठ रोटियाँ खिलाती थी। रामेश को याद आया कि किस प्रकार माँ ने अपनी आखिरी सोने की चूड़ी बेचकर उसके कॉलेज की फीस भरी थी। इन यादों ने रामेश की आँखों में पश्चाताप के आँसू ला दिए।
जब रामेश गाँव पहुँचा, तो उसने देखा कि माँ एक पुरानी खाट पर बेजान सी लेटी हुई थीं। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और शरीर काफी कमज़ोर हो गया था। रामेश भागकर उनके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने माँ का हाथ थाम लिया, जो अब बहुत खुरदुरा और सूखा हो गया था। रामेश ने रोते हुए पुकारा, "माँ, मुझे माफ कर दो! मैं आ गया हूँ माँ।"
पार्वती जी ने धीरे-धीरे अपनी कमजोर आँखें खोलीं। जैसे ही उन्होंने रामेश का चेहरा देखा, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने अपने कांपते हाथों से रामेश के चेहरे को छुआ और धीमी आवाज़ में कहा, "मेरा बेटा आ गया। मुझे पता था तू ज़रूर आएगा। मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं है बेटा।" माँ के मुख से ये शब्द सुनकर रामेश का दिल बैठ गया। उसने माँ को गले से लगा लिया। उस समय रामेश को महसूस हुआ कि दुनिया की सारी ज़मीन-जायदाद, गाड़ी-बंगला और पैसा, माँ के इस पवित्र और निश्चल आँचल के सामने बिल्कुल फिके और तुच्छ थे।
रामेश ने तय किया कि वह अब माँ को छोड़कर कभी नहीं जाएगा। उसने शहर के अपने बड़े फ्लैट को बेच दिया और अपना तबादला नज़दीकी शहर में करवा लिया ताकि वह रोज़ गाँव आकर अपनी माँ की सेवा कर सके। पार्वती जी के चेहरे पर अब एक नई चमक आ गई थी। उनका खोया हुआ बेटा उनके पास वापस आ गया था। रामेश अब रोज़ सुबह माँ का आशीर्वाद लेकर काम पर निकलता और शाम को आकर उनके आँचल की छाँव में सुकून से बैठता था। उसने समझ लिया था कि माँ ही उसका स्वर्ग है।
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